Tuesday, 21 May 2013

आईपीएल का सावन आया ऐसा, टूट गई सारी आस


ये कैसी विडम्बना है कि अब छोटे-मोटे मैचों की भी फिक्सिंग होने लगी है। क्या कुछ खिलाड़ियों को पैसे की इतनी ज्यादा जरूरत आ पड़ी है कि वे अब फिक्सिंग तक उतर आए हैं, या फिर वे शार्टकट से पैसा कमाने की ज़द्दोज़हद में जुट गए हैं, क्या उन्हें अपनी काबलियत पर शक़ होने लगा है? दरअसल प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ में नए और प्रतिभावान खिलाड़ी कहीं ज्यादा आगे निकल जाते हैं। और हालहीं में बनें कुछ सीनियर्स खिलाड़ी अपनी पैठ जमाने में नाकामयाब साबित होते हैं। ये नाकामयाबी ही उन्हें शार्टकट का दरवाजा दिखाती है। वैसे मैच फिक्सिंग का मामला हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। 
      
       स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में फंसे राजस्थान रॉयल्स के श्रीसंत, अजीत संडीला और अंकित चाव्हाण की गिरफ्तारी से दूसरे खिलाड़ी ही नहीं बल्कि क्रिकेट प्रेमी भी दुखी होने से ज्यादा आक्रोशित हैं। क्रिकेटरों ने क्रिकेट के साथ ही नहीं बल्कि खेल प्रेमियों के साथ भी धोखा किया है। क्योंकि भारत में क्रिकेट की सफलता की वजह ऐसे क्रिकेट प्रेमी हैं जो कि इस खेल को मजहब की तरह देखते हैं, ऐसे में इस खेल में हुई यह शर्मनाक घटना खेल की लोकप्रियता को प्रभावित करती है। मैच फिक्सिंग में मुकाबले का फैसला ही फिक्स हो जाता है। कोई खिलाड़ी या टीम का कप्तान या तीन-चार खिलाड़ी मिलकर यह तय कर लेते हैं कि अमुक मैच हारना है। लेकिन स्पॉट फिक्सिंग को ज्यादा तवज्जों इसलिए मिलने लगी क्यों कि इसमें मैच फिक्सिंग की अपेक्षा जोखिम कम होता है। स्पॉट फिक्सिंग के अंतर्गत किसी विशेष गेंदबाज या बल्लेबाज को जरिया बनाकर कोई ओवर या कुछ गेंद या फिर मैच का कोई अहम हिस्सा फिक्स कराते हैं।

       स्पाट फिक्सिंग का यह काला जादू आईपीएल सीजन-5 में भी देखने को मिला था। इस मामले में पांच खिलाड़ियों को दोषी पाया गया था। मोहनीश मिश्रा, शलभ श्रीवास्तव, टीपी सुधींद्र, हरमीत सिंह और अभिनव बाली को इस मामले में दोषी पाया गया था। हालांकि ये अजीब सा संयोग ही है कि जब तीन प्रतिभाशाली क्रिकेटरों पर स्पॉट फिक्सिंग को लेकर लगाया गया एक साल का प्रतिबंध खत्म हुआ उसके कुछ समय बाद ही स्पॉट फिक्सिंग के नए काले कारनामों का खुलासा हुआ और उसमें भी तीन खिलाड़ियों को दोषी पाया गया। आईपीएल सीजन-5 में काले धब्बें गोवा के ऑफ स्पिनर अमित यादव, मध्य प्रदेश के बल्लेबाज मोहनीश मिश्रा व हिमाचल प्रदेश के आलराउंडर अभिनव बाली पर लगे थे। इन लोगों पर अब एक साल का प्रतिबंध का काला अध्याय समाप्त हो चुका है। जबकि मध्य प्रदेश के गेंदबाज टीपी सुधींद्र पर आजीवन व यूपी के गेंदबाज शलभ श्रीवास्तव पर पांच साल का प्रतिबंध लगाया गया था।

       आईपीएल के अलावा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भी स्पॉट फिक्सिंग के कई मामले सामने आ चुके हैं। क्रिकेट की दुनिया में सबसे पहले मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया था 1994 में पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान सलीम मलिक पर मैच फिक्स करने और ऑस्ट्रेलिया के पाकिस्तान दौरे पर शेन वार्न और मार्क वा को लचर प्रदर्शन करने के लिए पैसे की पेशकश का आरोप लगा। ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी शेन वॉर्न और मार्क वॉ पर 1994 में ही श्रीलंका दौरे के दौरान सटोरियों को पिच और मौसम के बारे में जानकारी देने का आरोप लगा उन्हें जुर्माना भी भरना पड़ा। उसके बाद फिक्सिंग का सिलसिला चल पड़ा। 1996 में भारतीय क्रिकेट टीम के मैनेजर सुनील देव ने कुछ भारतीय क्रिकेटरों पर मैच फिक्सिंग के लिए पैसे मांगने का आरोप लगाया। 1997 में मनोज प्रभाकर ने साथी क्रिकेटरों पर 1994 के श्रीलंका दौरे के दौरान फिक्सिंग कराने के लिए 25 लाख रुपए दिलाने का आरोप लगाया।
       1998 में पाकिस्तानी गेंदबाज अताउर रहमान और वसीम अकरम पर न्यूजीलैंड के खिलाफ खराब गेंदबाजी करने के लिए तीन लाख डॉलर की पेशकश करने का आरोप लगा। 1998 में पाक क्रिकेटर राशिद लतीफ ने वसीम अकरम, सलीम मलिक, इंजमाम उल हक और एजाज अहमद पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया। 1998 में शेन वार्न और मार्क वा ने माना कि उन्होंने वर्ष 1994 में श्रीलंका में खेले गए सिंगर कप के दौरान मौसम और पिच की जानकारी सट्टेबाज को बेची थी।
       2000 में दिल्ली पुलिस ने दक्षिण अफ्रीका के कप्तान हैंसी क्रोन्ये पर भारत के खिलाफ वनडे मैच में फिक्सिंग कराने का आरोप लगाया। हर्शेल गिब्स, पीटर स्ट्राइडम और निकी बोए पर भी उंगलियां उठी थीं। क्रोन्ये ने स्वीकार किया कि उन्होंने भारत में खेली गई एक दिवसीय सीरीज के दौरान अहम सूचनाएं 10 से 15 हजार डॉलर में बेचीं। अप्रैल 2000 में अफ्रीकी टीम के भारतीय टीम से 1994 में मुंबई में खेले गए एक मुकाबले में दो लाख पचास हजार डॉलर लेकर मैच हारने का खुलासा हुआ।

       जून 2000 में अफ्रीकी खिलाड़ी हर्शेल गिब्स ने स्वीकार किया था कि उनके एक पूर्व कप्तान ने उन्हें भारत में खेले गए एक मुकाबले में 20 से कम रन बनाने को कहा था। इसके बदले में उन्हें 15 हजार डॉलर दिए गए। 2000 में ही दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट प्रमुख अली बशिर ने खुलासा किया था कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के पूर्व सीईओ माजिद खान ने उन्हें बताया है कि विश्व कप-1999 के दो मैच पहले से ही फिक्स थे। ये मैच पाकिस्तान ने भारत और श्रीलंका के खिलाफ खेले थे। जून 2000 में क्रोन्ये ने कहा कि उन्होंने एक मैच में फिक्सिंग के लिए एक लाख डॉलर लिए थे। मगर मैच फिक्स नहीं किया। जुलाई 2000 में आयकर विभाग ने कपिल देव, अजहरुद्दीन, अजय जडेजा, नयन मोंगिया और निखिल चोपड़ा के माकानों पर छापे मारे। अक्टूबर 2000 में क्रोन्ये पर आजीवन प्रतिबंध लगाया गया। नवंबर 2000 में अजहरुद्दीन को फिक्सिंग का दोषी पाया गया जबकि अजय जडेजा, मनोज प्रभाकर, अजय शर्मा और भारतीय टीम के पूर्व फीजियो अली ईरानी के संबंध सट्टेबाजों से होने की पुष्टि की गई। दिसंबर 2000 में अजहरुद्दीन और अजय शर्मा पर आजीवन प्रतिबंध लगाया गया।
अगस्त 2004 में केन्या के पूर्व कप्तान मॉरिश ओडेंबे पर पांच साल का प्रतिबंध लगाया गया। उन्हें कई मैचों में पैसे लेकर फिक्सिंग करने का दोषी पाया गया था। नवंबर, 2004 में न्यूजीलैंड के पूर्व कप्तान स्टीफेन फ्लेमिंग ने दावा किया कि उन्हें एक भारतीय खेल आयोजक ने 1999 में खेले गए विश्व कप में खराब प्रदर्शन करने के लिए 3 लाख 70 हजार डॉलर की रकम पेश की थी।
2008 में मैरियन सैमुअल्स को दो साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया। उन पर 2007 में भारत दौरे के दौरान एक भारतीय सट्टेबाज द्वारा फिक्सिंग के लिए पैसे लेने का आरोप सिद्ध किया गया था। 2010 में दानिश कनेरिया और मार्विन वेस्टफील्ड को काउंटी क्रिकेट में फिक्सिंग की जांच के मामले में गिरफ्तार किया गया। हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

  2010 में इंग्लैंड दौरे के दौरान पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के तीन खिलाड़ी मोहम्मद आसिफ, मोहम्मद आमीर और पूर्व कप्तान सलमान बट स्पॉट फिक्सिंग मामले में दोषी पाए गए थे। मोहम्मद आसिफ और मोहम्मद आमीर नो बॉल फिक्स करके इस मामले में फंसे थे, जबकि पूर्व कप्तान सलमान बट की इस पूरे मामले में संलिप्तता थी। मामला सामने के आने के बाद तीनों खिलाड़ियों पर तुरंत अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। इसके अंतर्गत सलमान बट पर 10 साल का प्रतिबंध लगा, जबकि मोहम्मद आसिफ पर सात साल और मोहम्मद आमीर पर पांच साल का क्रिकेट खेलने पर प्रतिबंध लगा। इस मामले में नवंबर, 2011 में सलमान बट को 30 महीने, मोहम्मद आसिफ को एक साल और मोहम्मद आमीर को 6 महीने की जेल की सजा हुई।

क्रिकेट में मैच फिक्सिंग और स्पॉट फिक्सिंग का मामले पर दिमाग में चंद पक्तियां उमड़ रही हैं कि-

घनघोर घटा छाई सावन में,
बरस जा तू होले-होले
कुछ मै भीगू-कुछ तुझे भीगाऊं,
बारिश के इस मौसम में
सूखे पड़े थे खेत हमारे,
धरती भी गई थी गरमाई
न फसल उगी थी - न उगी थी घास,
लेकिन अबके आया सावन ऐसा
कि बढ़ गई थी हमारी आस
 विकास की उम्मीद पर,
हम निकले थे साथ-साथ
अफसोस! सावन आया भी कैसा,
न ठंडी हुई धरती न पूरी हुई आस। - विकास सक्सेना
  

Thursday, 9 May 2013

... दुनिया के सात अजूबे ...


       ये दुनिया बहुत ही खूबसूरत है। एक से बढ़कर एक दिलकश नज़ारों से सजी इस धरती को प्रकृति ने अलग ही ढंग से सजाया है। इस धरती को प्रकृति ने ऐसे कई तोहफों से नवाज़ा है,,, जिसकी कल्पना करना भी इंसान के लिए सपने सरीखा है। नेचर ने दुनिया को इतना रंगीन बनाया है,,, जिसके सामने इंसान की सोच के रंग भी फीके पड़ जाते हैं। दरअसल प्रकृति के इन खूबसूरत नज़ारों को और सुन्दर बनाने की ललक इंसान में हमेशा से रही है। इसी के चलते इंसानों ने धरती पर ऐसी खूबसूरत कृतियां तैयार कीं,,, जिनके नज़ारों ने इस दुनिया को और भी बेशकीमती बना दिया है।    
पूरी दुनिया में यूं तो इंसानों की बनाई गई ऐसी हज़ारों कृतियां हैं,,, जिन्हें देखकर आप अचंभित रह जाएंगे। लेकिन इन सबसे अलग दुनिया के सात अजूबों की बात ही कुछ अलग है। असल में ये अजूबे हैं इसलिए अलग हैं।  दुनिया के सात अजूबे अपनी वास्तु कला, इतिहास और भवन निर्माण की कला में अद्भुत होने की वजह से अजूबों की सूची में शामिल होते हैं। लगभग बाइस सौ साल पहले यूनानी विद्वानों ने पुराने समय के विश्व के 7 अजूबों की एक सूची बनाई थी। लंबे समय तक वह सूची चलती रही। लेकिन 7 जुलाई 2007 को यूनानी विद्वानों की ओर से चुने गये 7 अजूबों को बदल दिया गया। दरअसल ये बदलाव इसलिए किया गया था,,, क्यों कि सभी आश्चर्यजनक मानव निर्मित कृतियां टूट गयीं या ढह गईं थी। ये बात हैरान करती है कि दुनिया में सबसे प्राचीन सात अजूबों में से वर्तमान में सिर्फ एक ही इमारत शेष बची है। और वह है गीज़ा का विशाल पिरामिड। यह पिरामिड मिस्त्र में स्थित है। मिस्त्र में बने इन पिरामडों की रचना एक पहेली है। फाराओह खुफु की याद में बनाए गए इस पिरामिड की खासियत यह है कि,,, इनके पत्थरों को पानी में काटकर, फिर एक के ऊपर एक रखकर बनाया गया है। पत्थरों को कुछ इस तरह से रखा गया है कि इसमें एक बाल घुसने की भी जगह नहीं है। मजबूती और अनोखी कला की मिसाल ये इमारत अब तक समय की मार झेलता हुआ खड़ा है। शिल्पकारों ने अनोखी कला का परिचय देते हुए इस रचना को विशाल आकार दिया था। लेकिन शिल्पकारों की कल्पना को मूर्तरूप देने वाला अद्भुत नज़ारा आज भी यहां आने वाले लोगों के लिए एक पहली है।  
लेकिन 6 इमारतें इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दफन हो चुकी हैं। जिनमें से एक थी,,, बेबीलोन के झूलते बागीचे। इसके नाम से ही लगता है यह बगीचे कितने अनोखे होंगे। यह प्राचीन बेबीलोन में बना था जो आज इराक में अल-हिल्लह नामक स्थान के पास है। यह उद्यान यहां के राजा नेबूचड्नेजार ने 600 ईसवी पूर्व बनवाया था। कहा जाता है कि अपनी पत्नी को खुश करने के लिए उन्होने इस उद्यान बनवाया था। पर समय की मार और भूकंप ने इस विचित्र अजूबे को धरती में दफन कर दिया।
मिस्त्र में दुनिया का एक और अजूबा पाया जाता था और वह था सिकन्दरिया का प्रकाश स्तम्भ,,, माना जाता है समुद्री नाविकों को राह दिखाने के लिए इस प्रकाश स्तंभ की रचना की गई थी। हज़ारों साल पहले बनी इस इमारत की ऊंचाई 450 फीट तक बताई जाती है। मिस्त्र के देवता फराओ की याद में बना यह प्रकाश स्तंभ अब इतिहास की बात बनकर रह गया है।
वहीं चौथा अजूबा था ओलंपिया में जियस की मूर्ति,, जो कि यूनान में स्थित थी। इस मूर्ति का निर्माण यूनानी मूर्तिकार फ़िडी्यास ने ईसा से 432 साल पूर्व किया था। इस मूर्ति को यूनान के ओलंपिया में स्थित जियस के मंदिर में स्थापित किया गया था। इस मूर्ति में जियस को बैठी हुई अवस्था में दिखाया गया था। मूर्ति की ऊंचाई 12 मीटर थी। आग की वजह से इस इमारत को भी अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही देख सकते हैं।
    वहीं तुर्की में स्थित हैलिकारनेसस का मकबरा भी सात अजूबों में एक था। हैलिकारनेसस में बनी यह इमारत 150 फीट ऊंची थी। और एक मकबरे की आकृति में थी। 623 ईसा पूर्व इस इमारत की रचना की गई थी। मौसोलस नाम के शासक की याद में इस इमारत को बनवाया गया था।
    इतिहास के पन्नों में दफन प्राचीन सात अजूबों में से एक आर्तिमिस का मंदिर भी था। जो कि तुर्की स्थित में था। ग्रीक देवता अर्तिमिस को समर्पित इस मंदिर को बनने में 120 साल लगे थे। कहा जाता है कि कई हमलों की वजह से मूल मंदिर तो पहले ही तबाह हो गया था। लेकिन एलेक्जेंडर द ग्रेट ने इसे दोबारा से बनवाया था। पर फिर एक हमलावर ने इसे नष्ट कर दिया।
 वहीं नष्ट हो चुकी कृतियों में एक थी रोड्‌स के कोलोसस की मूर्ति,, जो कि करीब 300 ईसा पूर्व निर्मित हुई थी। यह राजा रोड्स की साइप्रस के राजा पर मिली जीत की खुशी में बनाई गई थी।. नष्ट होने से पहले इस मूर्ति की ऊंचाई लगभग 30 मीटर थी,,, जो कि इसे विश्व की सबसे बड़ी इमारत बनाती थी। भूकंप की वजह से यह इमारत भी ढह गई
    नेस्त्रोनाबूद हुईं ये कृतियां आज इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गई हैं। अब ना तो ये कृतियां रहीं,,, औऱ ना ही ये अजूबे रहे। बदलाव की एक लहर ने इन कृतियों से सात अजूबों का ताज छीन लिया। और नए सिरे से जन्म दिया सात अजूबों को। चुने हुए सात नए अजूबों की तरीख भी बड़ी अजीब है। 7 जुलाई 2007। यानी 07-07-07 को 7 नए अजूबों का जन्म। बदलाव की ये लहर 1999 में शुरू की गई। और इसके लिए मतदान हुआ 2005 को। पूरी दुनिया से करीब 200 मानव निर्मित कृतियों के नाम आए।. जो कम होते-होते सिर्फ 21 ही बचे। जिनमें से आखिरकार सात चुने गए। हालांकि कई देशों के लोगों ने चुनने के इस तरीके पर असहमति जताई। लेकिन वर्तमान के पन्नों में चुने हुए ही सात अजूबों का नाम लिखा गया।
   संसार के अब सात नए अजूबों में से एक है क्राइस्ट द रिडीमर। यानी उद्धार करने वाले ईसा मसीह की मूर्ति। जो कि ब्राजील के रियो डि जनेरियो में पहाड़ी के ऊपर स्थित है। ये मूर्ति 130 फुट ऊँची है। और यह क्रॉस या सलीब के आकार की है। जो कि ईसा मसीह का प्रतीक है,  कंक्रीट और पत्थर से बनी ये मूर्ति 1931 में बनाई गई थी। कहा जाता है कि लोगों की ओर से दिए गए दान से इसे बनाया गया था। यह विश्व में ईसा मसीह की सबसे बड़ी मूर्ति है।
   चीन की दीवार भी नए सात अजूबों में शामिल है।  चीन ने अपनी सुरक्षा के लिए सभी सीमाओं को एक दीवार से घेर दिया था। यह दीवार 5वीं सदी ईसा पूर्व में बननी शुरू हुई थी,,, और 16 वीं सदी तक बनती रही।. यह चीन की उत्तरी सीमा पर बनाई गयी थी। जिससे कि मंगोल आक्रमणकारियों को चीन के अंदर आने से रोका जा सके। यह लगभग 4000 मील यानी छह हज़ार चार सौ किलोमीटर तक फैली है। इसकी सबसे ज्यादा ऊंचाई 35 फुट है। जो इसे सुरक्षा देती है। यह दीवार इतनी चौड़ी है,,कि इस पर 5 घुड़सवार या 10 पैदल सैनिक गश्त लगा सकते हैं।. बाद में इसमें निरीक्षण मीनारें बना कर दूर से आते शत्रुओं पर निगाह रखने के लिये भी इस्तेमाल किया गया,,, साथ ही इसका इस्तेमाल चीन को दूसरे देशों से अलग करने के लिये भी हुआ। कहा जाता है कि इसे बनाने में 3000 मज़दूरों की जानें गईं और कई मजदूर इसे अपनी पूरी जिन्दगी भर बनाते रहे।
   रोम का कॉलोसियम भी इन सात अजूबो में से एक है। यह एक विशाल खेल स्टेडियम है। जिसे लगभग 70 सदी में सम्राट वेस्पेसियन ने बनाया था। इसमें 50,000 तक लोग इकट्‌ठे होकर जंगली जानवरों और गुलामों की खूनी लड़ाइयों के खेल देखा करते थे। इस स्टेडियम में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते थे। इस स्टेडियम की नकल करना आज तक नामुमकिन है। इंजीनियरों के लिए अब तक यह एक पहेली बना हुआ है।
   वहीं,, जार्डन का 'पेत्रा' भी वर्तमान के सात अजूबो में शामिल किया गया।. ऐतिहासिक शहर पेत्रा अपनी विचित्र और अनोखी वास्तुकला के लिए दुनिया के सात अजूबों में शामिल था।  अरब के रेगिस्तान के कोने में बसा पेत्रा 2000 साल पुराना शहर है। जो राजा अरेतास चतुर्थ की राजधानी था। यहां तरह तरह की इमारतें है जो लाल बलुआ पत्थर से बनी हैं और सब पर बेहतरीन नक्काशी की गई है। इसमें 138 फुट ऊंचा मंदिर, नहरें, पानी के तालाब और खुला स्टेडियम है। जिसमें 4000 लोग बैठते थे। पेत्रा जॉर्डन के लिए विशेष महत्व रखता है,,, क्यूंकि यह उसकी कमाई का जरिया है।
     दक्षिण अमरीका में एंडीज पर्वतों के बीच बसा माचू पिच्चू शहर को भी वर्तमान सात अजूबों में शामिल किया गया। यह शहर पुरानी इंका सभ्यता का सबसे बढ़िया उदाहरण है।  यह 15वीं शताब्दी तक बसा हुआ था। सतह से 2430 मीटर ऊपर एक पहाड़ी पर बसा था ये शहर। जिसमें रहना और उस शहर को बनाना ही अपने आप में अजूबा है। माना जाता है कि कभी यह नगरी संपन्न थी। पर स्पेन के आक्रमणकारी अपने साथ चेचक जैसी भयानक महामारी यहां ले आए। जिसके कारण यह शहर पूरी तरह उजड़ गया
  चिचेन इत्जा इमारत भी सात अजूबों में से एक है।  मेक्सिको में बसी चिचेन इत्जा नाम का यह इमारत दुनिया में माया सभ्यता के गौरवपूर्ण काल की गाथा गाती है। यह सभ्यता यहां पर 750 से 1200 सदी के बीच फली-फूली और यह शहर इनकी राजधानी और धर्मिक नगरी थी। उस समय के कुशल कारीगरों की मेहनत को यह इमारत अपने आप में संजोए हुए है। शहर के बीचो-बीच कुकुलकन का मंदिर है,,, जो 79 फीट की ऊंचाई तक बना है। इसकी चार दिशाओं में 91 सीढ़ियां हैं। हरेक सीढ़ी साल के एक दिन का प्रतीक है और 365 वां दिन ऊपर बना चबूतरा है।
  मोहब्बत की बेमिसाल निशानी और मुगल स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने यानी ताजमहल को भी 7 नए अजूबों में शामिल किया गया। किसी ने सच ही कहा है कि दुनिया में प्यार से प्यारा और खूबसूरत एहसास कुछ नहीं होता। प्यार की इसी खूबसूरती को मुक्कमल किया भारत के मुगल बादशाह शाहजहां ने। जिन्होने अपनी मुहब्बत की य़ाद में बनवाई वो इमारत जिसे पूरी दुनिया ताज़ महल के नाम से जानती है। किताबों के पन्नों और टीवी में दिखने वाली ताज़ महल की अगर असल खूबसूरती देखनी है तो आपको आगरा आना होगा। दरअस्ल शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में ये ताजमहल बनवाया था। यह 1632 में बना और 15 साल में पूरा हुआ। कहा जाता है कि शाहजहां को उसके पुत्र ने बुढ़ापे में बंदी बना लिया था,,, और उसने अपने अंतिम दिन कैद में से ताजमहल को देखते हुए बिताए थे। यह खूबसूरत गुंबदों वाला महल चारों तरफ बगीचों से घिरा है। क्षितिज पर इसके ताज के आकार के अलावा कुछ नजर नहीं आता और मुगल शिल्पकला का यह सबसे बढ़िया उदाहरण माना जाता है। 
    दुनिया के इन सात अजूबों को देखने की चाहत सभी के दिल में है। लेकिन दुनिया के अलग-अलग देशों में होने की वजह से बहुत ही कम लोग इसके दर्शन कर पाते होंगे। इस दुनिया में ऐसी कई ऐतिहासिक इमारतें हैं। जिन्हे देखने पर अजूबों का एहसास होता है। दरअसल ये दुनिया अजूबों से भरी पड़ी है। जिनमें से कुछ तो प्रकृति की देन हैं। तो कुछ अजूबे मानव मस्तिष्क की उपज। लेकिन मानव निर्मित ऐसी कई कृतियां हैं,, जो या तो नष्ट हो चुकीं हैं। या फिर उन पर अब संकट के काले बादल मंडराने लगे हैं। क्योंकि वर्तमान के ये अजूबे सदियों पुराने हैं। इन अजूबों को भले ही प्राकृतिक आपदा का शिकार होना पड़ रहा हो। लेकिन ये सच है कि प्रकृति की खूबसूरत धरोहर को इंसानी सोच खत्म करता जा रहा है।    समुद्र, पहाड़ और ज़मीन के मिलन से प्रकृति ने कुछ और भी ऐसे खूबसूरत नज़ारे हमारे लिए तैयार किए हैं। जो कि इंसानी सोच से बहुत दूर हैं। हालांकि इंसानों ने भी अपनी कोशिश के बलबूते कुछ खूबसूरत नज़ारे तैयार तो ज़रूर किए हैं,,, जिनकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती है। बावजूद इसके ये धरोहर आज भी लोगों के दिलों पर राज करते हैं। क्यों कि इसकी अद्भुत सुंदरता की चमक सदियों पुरानी होने के बावजूद भी फीकी नहीं पड़ी है।

Thursday, 10 May 2012

वादी-ए-कश्मीर है जन्नत का नज़ारा




          हर चेहरा यहां चांद है, हर जर्रा सितारा।
             ये वादी-ए-कश्मीर है, जन्नत का नजारा।।
भारतीय उपमहाद्वीप का एक हिस्सा जम्मू-कश्मीर,,, जो प्राकृतिक सुंदरता के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यही वजह है कि इसे धरती के स्वर्ग के नाम से भी पुकारा जाता है,,, यहां की फ़िज़ा इतनी खूबसूरत है। कि ये हर किसी का मन मोह लेती है। कश्मीर की गिनती दुनिया के चुनिंदा पर्यटन स्थलों में होती है। तभी तो पर्यटकों से हर साल गुलजार होती है वादी-ए-कश्मीर। यहां देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी हजारों सैलानी आते हैं। गर्मियों के दस्तक देते ही यहां पर्यटकों का जमावड़ा लगना शुरू हो जाता है। गुलमर्ग जम्‍मू और कश्‍मीर का एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। इसकी सुंदरता को देखकर आप खुद ही समझ जाएंगे कि कश्मीर को धरती का स्‍वर्ग क्यों कहा जाता है। फूलों के प्रदेश के नाम से मशहूर यह स्थान बारामूला जिले में स्थित है। समुद्र तल से 2730 मी की ऊंचाई पर बसे गुलमर्ग में सर्दी के मौसम के दौरान यहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। गुलमर्ग की स्थापना अंग्रेजों ने 1927 में अपने शासनकाल के दौरान की थी।कहा जाता है कि गुलमर्ग का असली नाम गौरीमर्ग था,, जो यहां के चरवाहों ने इसे दिया था। 16वीं शताब्दी में सुल्‍तान युसुफ शाह ने इसका नाम गुलमर्ग रखा।यहां के हरे भरे ढलान सैलानियों को अपनी ओर खींचते हैं।दुनिया के सबसे ऊँचे बर्फ़ीले क्षेत्रों में से एक गुलमर्ग कश्मीर की ख़ूबसूरती को दूर से ही झलकाता है।प्रकृति के अद्भुत नजारे देखने हों या ट्रैकिंग का मजा लेना हो, गुलमर्ग आपके लिए बिल्कुल सही जगह है। इसकी खूबसूरती की कोई मिसाल नहीं सर्दी के दिनों में पहाड़ियों पर दूर तक जमी हुई बर्फ आपको रिझाएगी, तो गर्मी के दिनों धरती पर चादर की तरह फैले फूल आपका मन को मोह लेंगे। धार्मिक पर्यटक स्थलों से भी गुलजार होती हैं यहां की जमीं। गुलमर्ग की वादियों का आनंद अब सामान्य पर्यटक ही नहीं बल्कि तीर्थ पर्यटक यानी अमरनाथ यात्री भी ले रहे हैं।हर साल लाखों भक्त अमरनाथ दर्शन के लिए आते हैं। समुद्र तल से करीब 14 हजार फीट की ऊंचाई पर दक्षिणी कश्मीर के बर्फीले पहाडों में श्री अमरनाथ की पवित्र गुफा स्थित है। इसी विशाल प्राकृतिक गुफा में हिमलिंग बनता है। गुफा करीब एक सौ फीट लंबी और 150 फीट चौड़ी है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को पर्वतों, पानी, ठंडी हवा और ग्लेशियर से गुजरना पड़ता है।ये लाखों भक्त पहलगाम होते हुए अमरनाथ पहुंचते हैं। और तीर्थ पूरा कर हजारों भक्त गुलमर्ग का रुख़ कर लेते हैं। जिससे उन्हें दर्शन के साथ-साथ कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता का भी नजारा देखने को मिल जाता है। आज यह सिर्फ पहाड़ों का शहर नहीं है, बल्कि यहां विश्व का सबसे बड़ा गोल्फ कोर्स और देश का प्रमुख स्‍कीन रिजॉर्ट है। दुनिया के हरे-भरे गोल्फ कोर्स में गुलमर्ग गोल्फ कोर्स का नाम भी शुमार है। यहां आप कई विदेशियों को भी गोल्फ खेलते हुए देख सकते हैं। अंग्रेज यहां अपनी छुट्टियां बिताने आते थे। उन्‍होंने ही गोल्‍फ के शौकीनों के लिए 1904 में इन गोल्‍फ कोर्स की स्थापना की थी। वर्तमान में इसकी देख रेख जम्‍मू और कश्‍मीर पर्यटन विकास प्राधिकरण करता है। स्‍कींग में रुचि रखने वालों के लिए गुलमर्ग देश का नहीं बल्कि इसकी गिनती विश्‍व के सर्वोत्तम स्‍कींग रिजॉर्ट में की जाती है। मई से सितम्बर और नवम्बर से फरवरी के बीच गुलमर्ग का मौसम सुहावना होता है। दिसंबर में बर्फ गिरने के बाद यहां बड़ी संख्या में पर्यटक स्‍कींग करने आते हैं। जो लोग स्‍कींग सीखना चाहते हैं, उनके लिए भी यह जगह बिल्कुल सही है। यहां स्‍कींग की सभी सुविधाएं और अच्‍छे प्रशिक्षक भी मौजूद हैं। गुलमर्ग में दुनिया की सबसे ऊंची केबल कार चलती है। यह केबल कार पांच किलोमीटर की दूरी तय करके आपको 14,400 फीट की ऊंचाई तक ले जाएगी। इतनी ऊंचाई से वादियां को देखने का मजा ही कुछ और है। चारों तरफ देखने पर ऐसा प्रतीत है कि मानो हम प्रकृति की गोद में आ गए हों।  प्रकृति का ये खूबसूरत नजारा किसी जन्नत से कम नहीं होता है।

     कश्मीर के ज्यादातर लोगों के लिए टूरिज्म एक व्यवसाय का साधन भी है।  यहां के लोगों की रोजी रोटी पर्यटकों पर निर्भर होती हैं। पर्यटकों की संख्या जितनी अधिक होती है। उनकी खुशियां भी उतनी ही बढ़ जाती हैं।  अपनी छोटी-2 खुशियों को और अधिक बढ़ाने के लिए कुछ लोग अपने पूरे परिवार के साथ इस कारोबार से जुड़े  हैं।  इनकी चाहत बस इतनी ही रहती है कि ज्यादा से ज्यादा पर्यटक यहां आकर प्रकृति की इस खूबसूरती का लुत्फ़ उठाएं। जिससे कि यहां की महकती फिजाएं और खुली वादियां इन्हें  दोबारा आने पर मजबूर कर दें।हस्‍त‍शिल्‍प जम्मू और कश्मीर का परपंरागत उद्योग है। हाथों से तैयारी की गई  परंपरा की निशानी है पश्मीना शॉल। परंपरा की इस निशानी को और सुंदर बना देती है, इस पर होने वाली कारीगरी। कहीं सोजनी वर्क,, तो कहीं महीन तिल्ला वर्क इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देता है। हिमालय के ऊपरी इलाकों में रहने वाली पश्मीना नामक बकरी से मिलने वाले बेहतरीन ऊन से कश्मीरी कारीगर शॉल और स्कार्फ बनाते हैं,,, जिनकी देश-विदेश में भारी मांग हैं। कश्मीर में कालीन निर्माण का काम भी भारी मात्रा में होता है।ये कालीन इतनी खूबसूरत होती हैं कि इनकी मांग देश में हीं नहीं बल्कि विदेशों में भी जबरदस्त है। कश्मीर के पर्यटन स्थल सिर्फ गर्मियों में ही नहीं,, बल्कि सर्दियों में भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। जम्मू-कश्मीर के पर्यटन स्थलों का रोचक तथ्य यह है कि आतंकवाद के दिनों में भी यहाँ आने वालों के कदम कभी ठिठके नहीं हैं। अंतर बस इतना होता है कि वे एक पर्यटन स्थल पर नहीं पहुँच पाते तो दूसरे पर चले जाते हैं। राज्य में यूँ तो कई पर्यटन स्थल हैं जहाँ जाने की चाहत हर आने वाले पर्यटक की होती है,,, पर गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम,  चंदनवाड़ी, बेताबवेली, और पटनीटाप जाए बिना शायद ही कोई रह पाता हो। इनमें से पहले तीन तो कश्मीर वादी में अलग-अलग दिशाओं में हैं तो चौथा पटनीटाप जम्मू संभाग में कश्मीर की ओर जाते हुए रास्ते में पड़ता है। कश्मीर की सुंदरता को चार चांद लगाती है यहां की डल झील।  तीन दिशाओं से पहाड़ियों से घिरी डल झील जम्मू-कश्मीर की दूसरी सबसे बड़ी झील है। पर्यटक जम्मू-कश्मीर आएँ और डल झील देखने न जाएँ ऐसा हो ही नहीं सकता। बीते दौर के प्रख्यात अभिनेता शम्मी कपूर की अस्थियां भी इसी डल झील में प्रवाहित की गईं थी। डल झील के पास ही मुगलों के सुंदर और प्रसिद्ध पुष्प वाटिका से डल झील की आकृति और उभरकर सामने आती है। मुख्य रूप से इस झील में मछली पकड़ने का काम होता है। डल झील के मुख्य आकर्षण का केन्द्र है यहाँ के हाउसबोट। सैलानी इन हाउसबोटों में रहकर इस खूबसूरत झील का आनंद उठाते हैं यह झील, कश्मीर की घाटियों की अन्य धाराओं के साथ मिल जाती है। झील के चार जलाशय हैं गगरीबल, लोकुट डल, बोड डल और नगीन। लोकुट डल के मध्य में रूप लंक द्वीप स्थित है।जबकि बोड डल जलधारा के मध्य में सोना लंक स्थित है। कमल के फूल, पानी में बहती कुमुदनी, झील की सुंदरता में चार चाँद लगा देती है। सैलानियों के लिए यहां कई प्रकार के मनोरंजन के साधन भी उपलब्ध हैं। जैसे कि कायाकिंग यानी कि नौका विहार, केनोइंग यानी डोंगी, पानी पर तैरना और मछली पकड़ना आदि ।डल के एक किनारे पर स्‍थित है शंकराचार्य मंदिर और दूसरे किनारे पर है हजरत बल दरगाह। कश्‍मीर विश्वविद्यालय डल के तट पर ही स्थित है। शिकारे के माध्यम से सैलानी नेहरू पार्क, कानुटुर खाना, चारचीनारी, कुछ द्वीप जो यहाँ पर स्थित हैं, उन्हें देख सकते हैं। एक शिकारे पर सवार होकर सैलानी विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ भी खरीद सकते हैं। क्योंकि दुकानें भी शिकारों पर ही लगी होती हैं। सर्दियों के मौसम में इस झील में बर्फ की चादर पड़ने लगती है। 1960 में इस झील का पानी पूरी तरह से जम गया था और इसके बाद यह 1986 में भी पूरी तरह बर्फ बन गया था।ये वही डल है जिसके जमें हुए पानी पर वर्तमान केंद्रीय मंत्री फारुख अब्‍दुल्‍ला जीप चला चुके हैं।आज भी सर्दी के दिनों में बच्‍चे डल पर क्रिकेट खेलते हैं।        कश्मीर की खुली फिजाओं में आती भीनी-भीनी सी केसर की महक यहां आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। केसर,, देश के मौजूद अनमोल प्राकृतिक संपदाओं में से एक है। बेशकीमती केसर का इस्तेमाल कई प्रकार की दवाइयों में किया जाता है। आजकल तो कॉस्मेटिक प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियां भी केसर का खूब इस्तेमाल करने लगी हैं। विश्व भर में गिने-चुने देशों को ही प्रकृति ने केसर का उपहार दिया है। इनमें से भारत भी एक है। खास बात यह है कि भारत में पायी जाने वाली केसर की गुणवत्ता स्पेन और ईरान से भी कहीं ज्यादा बेहतर है। यही वजह है कि भारतीय केसर की कीमत स्पेन और ईरान की केसर से दस गुना ज्यादा होती है। भारत में भी केवल जम्मू-कश्मीर में ही केसर की खेती होती है।कश्मीर के अंवतीपुरा के पंपोर और जम्मू संभाग के किश्तवाड़ इलाके में केसर की खेती की जाती है। पंपोर में लगभग 10 से 15 किलोमीटर के क्षेत्र में केसर की खेती होती है, जबकि किश्तवाड़ के पुशाल, हिड़ियाल, तुंद, मत्ता, चिराड़ आदि गांवों की लगभग एक हजार कैनाल जमीन में केसर की खेती की जाती है। हालांकि गुणवत्ता के मामले में किश्तवाड़ की केसर कश्मीरी केसर से बेहतर मानी जाती है। केसर बोने के लिए खास जमीन की आवश्यकता होती है। ऐसी जमीन जहां बर्फ पड़ती हो और जमीन में नमी मौजूद रहती हो। जिस जमीन पर केसर बोयी जाती है वहां कोई और खेती नहीं की जा सकती।कारण है कि केसर का बीज हमेशा जमीन के अंदर ही रहता है। केसर का थोक भाव तो 30 से 35 हजार रुपए प्रति किग्रा होता है। जबकि खुले बाजारों में ये 45 से 50 हजार रुपए प्रति किग्रा के भाव से बिकते हैं। कश्मीर की इस जमीं पर लाल-गुलाबी सेबों का जिक्र न हों तो ये अधूरी सी बात लगती है।कश्‍मीर के सेब सिर्फ देश में ही नही बल्‍कि दुनिया भर में मशहूर हैं।सेब के अलावा यहां के अखरोट और बादाम जैसे सूखे मेवों की मांग भी सबसे ज्‍यादा है।
  
   कितनी खूबसूरत ये तस्वीर है,,, ये कश्मीर है, ये कश्मीर है,

जी हां बेमिसाल फिल्म का ये खूबसूरत गीत कश्मीर की सुदंरता को चंद शब्दों में पिरो तो रहा है। लेकिन इन शब्दों से कश्मीर की खूबसूरती बयां कर पाना शायद कुछ कम होगा। हिमालय की गोद में बसे कश्मीर की खूबसूरत वादियों के चप्पे चप्पे में संगीत बसा है। यही वजह है कि कश्मीर की प्राकृतिक सुदंरता का अछूता बॉलीवुड भी नहीं रहा है।सत्तर के दशक की कई फिल्मों में कश्मीर की वादियां देखी जा सकती हैं। फिल्मकारों के कैमरे में कश्मीर की हजारों खूबसूरत तस्वीरें कैद हैं। अपनी सुंदरता और पहाड़ी वादियों के अलावा चिनार के पेड़ों और खूबसूरत डल झील के चलते यहां कई फिल्में बन चुकी हैं। 'दो बदन', 'कश्मीर की कली', 'जब जब फूल खिले', 'आरजू', 'कभी कभी' और 'बाबी' जैसी मोहब्बत भरी हिट फिल्में बालीवुड ने दी है।     
        ये हंसी वादियां, ये खुलां आसमां, आ गए हम कहा ऐ मेरे साजना।
रोजा फिल्म का ये दिल छू लेता गीत भी कश्मीर में फिल्माया गया है। इस गीत के बोल भी कश्मीर की सुंदरता को बयां कर रहे हैं।लेकिन बदलते वक्त के साथ कश्मीर की जगह स्विट्जरलैंड और अन्य विदेशी जगहों ने ले ली। कारण महज बदलाव नहीं बल्कि घाटी में पसरा तनाव भी था। लेकिन अब कश्मीर दोबारा फिल्‍म निर्माताओं की पसंद बन रहा है। 'सात खून माफ' और 'रॉकस्टार' फिल्म इसका साक्ष्य है।कश्मीर की सुदंरता को देखते हुए बॉलीवुड एक बार फिर कश्मीर की ओर रूख करने को बेताब है।
   कश्मीर का इतिहास सदियों पुराना है। कश्मीर का प्राचीन नाम कश्यपमेरु और कश्यपमीर था। जिसका मतलब था कश्यप का झील। कहा जाता है,, कि महर्षि कश्यप श्री नगर से तीन मील दूर हरि-पर्वत पर रहते थे। यहाँ  प्रागैतिहासिक काल में एक बहुत बड़ी झील थी,,, जिसके पानी को निकाल कर महर्षि कश्यप ने इस स्थान को मनुष्यों के बसने योग्य बनाया था कश्मीर में  मौर्य सम्राट अशोक के समय में बौद्धधर्म ने पहली बार प्रवेश किया। श्रीनगर की स्थापना इस मौर्य सम्राट ने ही की थी। 13वीं सदीं में कश्मीर मुसलमानों के प्रभाव में आयाईरान के हज़रत सैयद अली हमदान नामक संत ने अपने धर्म का यहाँ जोरों से प्रचार किया,,, और धीरे-धीरे राज्यसत्ता भी मुसलमानों के हाथ में पहुँच गईकश्मीर के मुसलमानों का राज्य 1338 ई॰ से 1587 ई॰ तक रहाऔर ज़ेनुलअब्दीन के शासनकाल में कश्मीर भारत और ईरानी संस्कृति का प्रख्यात केंद्र बन गया। इस शासक को उसके उदार विचारों और संस्कृति प्रेम के कारण कश्मीर का अकबर कहा जाता है। 1587 से 1739 ई॰ तक कश्मीर मुग़ल साम्राज्य का अभिन्न अंग बना रहा। जहांगीर और शाहजहां के समय के अनेक स्मारक आज भी कश्मीर के सर्वोत्कृष्ट स्मारक माने जाते हैं। इनमें निशात बाग़, शालीमार बाग आदि प्रमुख हैं। 1739 से 1819 ई॰ तक काबुल के राजाओं ने कश्मीर पर राज्य किया। 1819 ई॰ में पंजाब केसरी रणजीत सिंह ने कश्मीर को काबुल के अमीर दोस्त मुहम्मद से छीन लिया। और जल्द ही कश्मीर अंगेज़ों के हाथ में आ गया। 1846 ई॰ में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कश्मीर को डोंगरा सरदार गुलाब सिंह के हाथों बेच दिया। सन 1925 में महाराजा गुलाब सिंह के सबसे बड़े पौत्र महाराजा हरि सिंह ने यहां की गद्दी संभाली,,, जिसके बाद उन्होने 1947 ई. तक शासन किया। कश्मीर के महाराजा हरि सिंह आज़ाद रहना चाहते थे। लेकिन काबायली हमले के बाद में उन्होंने भारत में मिलने का फ़ैसला कर लिया। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय कर दिया था। 27 अक्टूबर 1947 को लार्ड माउण्टबेटन ने विलय पत्र स्वीकार तो किया,, लेकिन उन्होंने इसके जवाब में एक पत्र लिखकर जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की बात कही। 1 नवंबर 1947 को उन्होंने लाहौर में मोहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करते हुए जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की बात स्वीकार की। जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने भी अपनी सहमति जताई। जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का अधिकार लार्ड माउण्टबेटन के पास नहीं था। क्योंकि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय उसी तरह किया गया जिस तरह अन्य रियासतों का। भारतीय स्वाधीनता अधिनियम के तहत किसी भी रियासत को भारत या पाक में शामिल होने की स्वतंत्रता थी। इसी अधिनियम के तहत महाराजा हरिसिंह ने भी जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय किया। इसके बाद से ही ये इलाका भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। कश्मीर को लेकर दोनों देशों के बीच दो युद्ध 1947-48 और 1965 में हो चुके हैं।
सरहद के दोनों ओर चहकता ये चमन रहें, इन सुंदर वादियों से महकता वतन रहें
कश्‍मीर न सिर्फ धरती का स्‍वर्ग है बल्‍कि देश का सिरमौर भी है। स्‍वर्ग का जितना खूबसूरत रूप आज हमारे सामने है उससे भी ज्‍यादा सुंदर दिखता अगर दो दशक पहले वादियों में बारुदी गंध नही घुला होता। हर दिन गरजते बंदूक की शोर ने वादियों से पर्यटक पंछी को उड़ने के लिए मजबूर कर दिया था लेकिन एक बार फिर घाटी में मौसम बदलने लगा है। अब वहां पर न तो बारुद की गंध और न ही बंदूक की गरज।तभी तो घाटी कह रही है। आओ कि जन्‍नत ने खोल दी है बाहें।